AROHAN FOUNDATION

आरोहण ने देखा है

“आरोहण ने देखा है”

 

सड़क किनारे वाली लाइट में पढ़ते देखा है ,
किताबों के लिए लड़ते देखा है ,
कई बार तेरा घर उजड़ते देखा है ,
कूड़ों की ढेरों से खिलौने ढूँढ़ते देखा है ,
जगमगाते शहर में तेरे घर पर “दिया” जलते देखा है ,
माघ मेले में राधा-कृष्ण बन कर झोली फैलाते देखा है ,

सड़क किनारे वाली लाइट में पढ़ते देखा है ,
किताबों के लिए लड़ते देखा है ,
बिस्कुट का टुकड़ा पाकर मुस्कुराते देखा है ,
बगल वाली दुकान पर चाय पिलाते देखा है ,
दूसरों के दिए कपड़ों को मां से सिलाते देखा है ,
कड़ाके की ठण्ड में तन को कांपते देखा है ,

सड़क किनारे वाली लाइट में पढ़ते देखा है ,
किताबों के लिए लड़ते देखा है ,
पथरीले रास्तों पर बिन चप्पल दौड़ते देखा है ,
भंडारों में खाने के लिए भागते देखा है ,
भूंखी बहन को फुसलाते मनाते देखा है ,
कोमल गालों पर बहते आंसुओं को सूखते देखा है ,

सड़क किनारे वाली लाइट में पढ़ते देखा है ,
किताबों के लिए लड़ते देखा है ,
नन्ही सी आँखों को सपने मढ़ते देखा है ,
दो जून की रोटी की चिंता में माँ-बाप को लड़ते देखा है ,
मुसीबतों को गले लगाते देखा है ,
सर्कस की पतली डोर पर बचपन लड़खड़ाते देखा है ,

सड़क किनारे वाली लाइट में पढ़ते देखा है ,
किताबों के लिए लड़ते देखा है ,
अकसर त्योहारों के दिन बिलखते देखा है ,
अरहल की दाल के लिए महीनों परखते देखा है ,
दीवाली में फेके हुए पटाखों में आग लगाते देखा है ,

 
 
Saurabh Singh Parihar
Writer

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